अगर आप भारतीय इतिहास पढ़ रहे हैं तो उसमें आपने देखा होगा कि सिंधु घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण अध्याय है जो मैं केवल सिविल सर्विस परीक्षा के लिए अपितु SSC , BANK , RAILWAY , POLICE , LDC इन सभी परीक्षाओं के लिए भी बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है अगर आप अपनी तैयारी नोट्स के माध्यम से करना चाहते हैं तो दिए गए टाइटल के संपूर्ण नोट्स सामने नीचे अपलोड कर दिए हैं जिसे आप घर बैठे बहुत ही अच्छे से तैयारी कर सकते हैं 

सिंधु घाटी सभ्यता

सिंधु घाटी सभ्यता की खोज

★    सर्वप्रथम 1826 ई. में चार्ल्स मैसन ने (1842) में प्रकाशित एक लेख के द्वारा भारत में एक प्राचीनतम नगर हड़प्पा के होने की बात कही।

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★    1834 ई. बर्नेश ने किसी नदी के किनारे ध्वस्त किले के होने की बात कही। 

★    1851-53 ई. में अलेक्जेण्डर कनिंघम ने हड़प्पा के टीले का सर्वेक्षण किया। 

★    1856 ई. में पहली बार ए. कनिंघम ने हड़प्पा का मानचित्र जारी किया था।

★    1861 ई. में कनिंघम ने भारतीय पुरातत्त्व विभाग की स्थापना की। 

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हड़प्पा संस्कृति का विस्तार                                 

★    सैंधव सभ्यता का भौगोलिक विस्तार उत्तर में मांडा (जम्मू) से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक तथा पश्चिम में सुत्कागेंडोर से लेकर पूर्व में आलमगीरपुर (मेरठ) तक था। 

★    यह उत्तर से दक्षिण लगभग 1400 किमी. तक तथा पूर्व से पश्चिम लगभग 1600 किमी. तक फैली हुई थी। अभी तक उत्खनन तथा अनुसंधान द्वारा करीब 2800 स्थल ज्ञात किए गए हैं।

★    वर्तमान में नवीन स्थल प्रकाश में आने के कारण अब इसका आकार – विषमकोणिय चतुर्भुजाकार है।

★    1856 ई. में कराची से लाहौर रेलवे लाइन बिछाते समय जॅान बर्टन व विलियम बर्टन के आदेशों से पहली बार हड़प्पा के टीले से कुछ ईंटे निकाली गई।

★    वास्तविक स्वरूप :- त्रिभुजाकार

★    1881 ई. में एक बार पुन: एलेक्जेण्डर कनिंघम हड़प्पा के टीले पर गए तथा वहाँ से कुछ मोहरें प्राप्त की।

★    1899-1905 के दौरान लॉर्ड कर्जन भारत में वायसराय बनकर आए तथा इन्होंने 1904 ई. में भारतीय पुरातत्त्व एवं सर्वेक्षण विभाग के अधीन भारत में प्राचीन इमारतों व नगरों के संरक्षण व सर्वेक्षण का आदेश पारित किया इसी के शासनकाल में जॉन मार्शल नए निदेशक के रूप में भारत आए। 

★    सन् 1921 में रायबहादुर दयाराम साहनी ने हड़प्पा के टीले की खोज की।

★    सन् 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो की खोज की।

★    हड़प्पा सभ्यता कांस्ययुगीन सभ्यता थी।

★    हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के भाग आते हैं।

★    जॉन मार्शल ’सिंधु सभ्यता’ नाम का प्रयोग करने वाले पहले पुरातत्त्वविद् थे।

★    अमलानन्द घोष ने ’सोथी संस्कृति‘ का हड़प्पा के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान माना है।

★    मोहनजोदड़ो की बहुसंख्यक जनता भूमध्यसागरीय प्रजाति की थी।

★    सिन्धु सभ्यता के नवीनतम स्थल-थार का मरुस्थल–वैंगीकोट व गुजरात में करीमशाही खोजे गए हैं।

नोट:- हाल ही में कोटड़ा आदली (गुजरात) की भी खोज हुई है, जहाँ से डेयरी उत्पादन के साक्ष्य मिले हैं।

सिंधु घाटी सभ्यता की नगर नियोजन की विशेषताएं

★    सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता अद्भुत नगर नियोजन व्यवस्था तथा जल निकासी प्रणाली थी। 

★    बस्तियाँ दो भागों में विभाजित थी। जिन्हें क्रमश: दुर्ग और निचला शहर नाम दिया गया है। 

★    दुर्ग में शासक वर्ग निवास करता था तथा दुर्ग चारों ओर से दीवार से घिरा था। इसे निचले शहर से अलग किया गया था। 

★    दूसरा भाग जिसमें नगर के साक्ष्य मिले हैं यहाँ सामान्य नागरिक, व्यापारी, शिल्पकार, कारीगर, श्रमिक वर्ग निवास करते थे। निचला शहर भी दीवार से घिरा था। 

★    सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थी। सड़कों के किनारे सुव्यवस्थित नालियाँ बनी थी। यह नालियाँ ऊपर से ढकी हुई होती थी। इनमें घरों से निकलने वाला गंदा पानी छोटी नालियों से होते हुए मुख्य सड़क पर बड़े नाले में मिल जाता था। हड़प्पा व मोहनजोदड़ो की नगर योजना लगभग समान थी। यहाँ पक्की हुई ईंटों का प्रयोग होता था।    

★    भवन निर्माण में पक्की एवं कच्ची दोनों तरह की ईंटों का प्रयोग होता था। भवन में सजावट आदि का अभाव था। प्रत्येक मकान में स्नानागार, कुएँ एवं गंदे जल की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध था। मकानों के दरवाजे मध्य में न होकर एक किनारे पर होते थे।

प्रमुख स्थल और उनके विशेष अवशेष

       स्थलनदी/सागर तट        उत्खननकर्ता
हड़प्पारावी नदीदयाराम साहनी
मोहनजोदड़ोसिंधु नदीराखालदास बनर्जी
लोथलभोगवा नदीएस. आर. राव
कालीबंगाघग्घर नदीअमलानन्द घोष
रोपड़सतलज नदीयज्ञदत्त शर्मा
कोटदीजीसिंधु नदीफजल अहमद खां
चन्हुदड़ोसिंधु नदीएन. जी. मजूमदार
रंगपुरमादर नदीएम.एस. वत्स
आलमगीरपुरहिन्डन नदीयज्ञदत्त शर्मा
सुत्कागेडोरदाश्क नदीऑरेल स्टाइन
बनावलीसरस्वती नदीरवीन्द्र सिंह विस्ट

रेडियो कार्बन पद्धति

★    खोज- बिलियर्डस F. Libbi के द्वारा संसार की प्रत्येक वस्तु में कार्बन के 2 अणु C12 व C14 पाये जाते हैं, जब तक   यह सजीव अवस्था में होते हैं, तब तक उनमें इन दोनों अणुओं की मात्रा समान रहती है, परन्तु जैसे ही कोई वस्तु मृत अवस्था में जाती है तो C12 की मात्रा स्थिर हो जाती है तथा C14 की मात्रा में कमी होना प्रारंभ हो जाती है। 

★    लगभग 5730 वर्ष बाद C14 की मात्रा घटकर आधी (½) रह जाती है। 

★    इसी आधार पर किसी भी वस्तु की आयु ज्ञात कर ली जाती है। 

★    रेडियो कार्बन (C-14) तिथि के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का सर्वमान्य काल (2300-1750) ई. पू. को माना जाता है।

प्रमुख स्थल तथा विशेषताएँ

हड़प्पा

★    स्टुअर्ट पिग्गट के अनुसार यह अर्द्ध-औद्योगिक नगर था। यहाँ के निवासियों का एक बड़ा भाग व्यापार, तकनीकी उत्पाद और धर्म के कार्यों में संलग्न था।  

★    इसकी खोज दयाराम साहनी ने वर्ष 1921 में की थी। यह मोंटगोमरी (पाक, पंजाब) वर्तमान में शाहीवाल में स्थित है।

★    नदी- रावी नदी (बायाँ तट)

★    उत्खनन – 2 बार

हड़प्पा से प्राप्त अन्य अवशेष

★    हड़प्पा से स्त्री के गर्भ से निकलते हुए एक पौधे की मृणमूर्ति प्राप्त हुई है, जिसे हड़प्पा वासियों ने उर्वरा देवी या पृथ्वी देवी माना गया है।  

★    यहाँ से बिना धड़ की एक पाषाण मूर्ति प्राप्त हुई।

★    हड़प्पा के सामान्य आवास क्षेत्र के दक्षिण में एक ऐसा कब्रिस्तान स्थित है जिसे “समाधी आर – 37” नाम दिया गया है। अन्य कब्र – H भी प्राप्त हुई है।

★    काँसे का दर्पण

★    प्रसाधन मंजूषा (श्रृंगार पेटी)

★    मानव के साथ बकरे के शवाधान के साक्ष्य 

★    सर्वाधिक अलंकृत मोहरें- हड़प्पा से जबकि सर्वाधिक मोहरें – मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई हैं। 

★    सैंधव सभ्यता की मोहरें सेलखड़ी (स्टेटाइड) से निर्मित होती थी।

मुहरें 3 प्रकार की होती थी-

1. आयताकार          2. वृत्ताकार          3. वर्गाकार (सर्वाधिक)

★    इन मोहरों पर एक श्रृंगी बैल या हिरण, कूबड़दार बैल, मातृदेवी, व्याघ्र, पशुपतिनाथ व भैंसा आदि का अंकन मिलता है। 

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प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत : साहित्यिक, पुरातात्विक और विदेशी विवरण

मोहनजोदड़ो

 

★    मोहनजोदड़ो सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर अवस्थित था, जो वर्तमान में पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के लरकाना जिले में स्थित है। इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में की थी। इसे सिंध का नखलिस्तान भी कहा जाता है। 

★    यह नगर 8 बार उजड़कर 9 बार बसा था। जिसके 7 क्रमिक स्तर मिले है। 

★    मोहनजोदड़ो की सबसे बड़ी इमारत अन्नागार थी तथा सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल ’विशाल स्नानागार’ था, इस स्नानागार का धार्मिक महत्त्व था। इसके चारों ओर जल भण्डारण हेतु बड़े-बड़े टैंक मिले हैं। इसे जॉन मार्शल ने तत्कालीन विश्व का आश्चर्यजनक निर्माण कहा साथ ही इसे विराट वस्तु की संज्ञा दी है। 

मोहनजोदड़ो से प्राप्त साक्ष्य

★    मोहनजोदड़ो से प्राप्त एक मोहर पर तीन मुख वाले एक देवता का अंकन किया गया है। जिसके चारों तरफ भैंसा, हाथी, गेंडा, व्याघ्र व निचले भाग पर 2 हिरण व ऊपरी भाग पर मछली व 10 अक्षरों का अंकन मिलता है।

★    जॉन मार्शल ने इसे पशुपतिनाथ की उपाधि प्रदान की, साथ ही इसे आद्यतम शिव की उपमा दी है।  

★    इस स्थल से मानव कंकाल (शायद नरसंहार) के साक्ष्य मिले हैं।

★    यहाँ से काँसे की नर्तकी की मूर्ति प्राप्त हुई है। इसका निर्माण द्रवी-मोम विधि से हुआ है। हड़प्पावासी तांबे और टिन को मिलाकर काँसे का निर्माण करते थे। 

★    मोहनजोदड़ो से प्राप्त मुहर पर एक योगी को ध्यान मुद्रा में एक टांग पर दूसरी टांग डाले बैठा दिखाया गया है।

लोथल

★    यह एक औद्योगिक नगर था । 

★    लोथल से मनके बनाने का कारखाना मिला है।

★    माप-बाट-माप-तौल के लिए पैमाना/हाथी दाँत पैमाना होता था।

★    यह सिन्धु सभ्यता का एक प्रमुख गोदीबाड़ा (डॉक यार्ड) बंदरगाह/पत्तन था।

★    सिकोत्तरी माता- समुद्री देवी थी।

★    चार नाव के साक्ष्य से द. पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार का पता चलता है।

★    सम्पूर्ण सैन्धव सभ्यता का सबसे बड़ा सार्वजनिक स्थल- लोथल का गोदीबाड़ा था। यहाँ से बंदरगाह के प्रमाण प्राप्त हुए हैं। लोथल उस समय पश्चिमी एशिया से व्यापार का प्रमुख स्थल था।  

★    यहाँ से खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के साक्ष्य मिले है।

★    तीन युगल शवाधान (एक साथ दफनाए शव) जिनका सिर उत्तर दिशा की तरफ तथा पैर दक्षिण दिशा की तरफ है। 

★    यहाँ से अग्निकुंड/अग्निवेदिकाएँ मिली हैं।

★    लोथल की सबसे प्रसिद्ध कृति पक्की ईंटो का बना जहाजों का डॉकयार्ड था, जो त्रिभुजाकार था। यहाँ से मिली मोहरों में सबसे महत्त्वपूर्ण वे हैं, जो ईरान की खाड़ी में मिली मुहरों के अनुरूप हैं, जिनसे मेसोपोटामिया और फ़ारस (ईरान) के साथ व्यापारिक संबंधों का पता चलता है।   

कालीबंगा

★    कालीबंगा से हड़प्पा सभ्यता के साथ-साथ हड़प्पा पूर्व सभ्यता के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं।

★    कालीबंगा राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में स्थित घग्घर नदी के किनारे स्थित है।

★    1961 ईस्वी में बी.बी. लाल तथा बी.के. थापर के निर्देशन में व्यापक पैमाने पर खुदाई की गई थी।

★    कालीबंगा का अर्थ काले रंग की चूड़ियाँ होती है।

कालीबंगा से प्राप्त साक्ष्य

●     ऊँट के प्रथम साक्ष्य

●    हल की आकृति व जोते हुए खेत के साक्ष्य मिले हैं।

●    कालीबंगा के लोग एक साथ 2 फसलें बोते थे।

●    दीन-हीन की बस्ती कहा जाता था।

●    लकड़ी की नालियों के साक्ष्य 

●    खोपड़ी की शल्य चिकित्सा के साक्ष्य

●    यहाँ से प्राप्त एक खोपड़ी मे छेद किए हुए मिले हैं।

★    कालीबंगा से 3 प्रकार के शवाधान के साक्ष्य मिले हैं-

●    आंशिक शवाधान

●    पूर्ण शवाधान

●    दाह संस्कार

★    कालीबंगा से विश्व के प्रथम भूकम्प के साक्ष्य मिले, जो कि लगभग 2100 ई.पू. के आसपास आया होगा।

★    अलंकृत फर्श, ईँट तथा बेलनाकार मोहरे व हवनकुण्ड के साक्ष्य।

नोट- डॉ. दशरथ शर्मा ने कालीबंगा को हड़प्पा संस्कृति की तीसरी राजधानी कहा।

★    बेलनाकार मोहरें मेसोपोटामिया में भी प्रचलित थी, अत: यह कहा जा सकता है, कि संभवत: कालीबंगा के व्यापारिक संबंध मेसोपोटामिया के साथ रहे होंगे।

चन्हुदड़ो

★    चन्हुदड़ो, मोहनजोदड़ो से 130 किमी. दक्षिण में स्थित है। इसकी सर्वप्रथम खोज सन् 1931 में नानी गोपाल मजूमदार (NG मजूमदार) ने की थी। उत्खनन वर्ष 1935 में अर्नेस्ट मैके द्वारा किया गया।

★    चन्हुदड़ो सिंधु घाटी सभ्यता का एकमात्र पुरास्थल है, जहाँ से वक्राकार ईंटें मिली हैं। 

★    यह एक औद्योगिक केंद्र था। यहाँ से मनका बनाने का एक कारखाना प्राप्त हुआ है।

चन्हुदड़ो से प्राप्त साक्ष्य –

★    मनके बनाने के कारखाने के साक्ष्य

★    सौंदर्य प्रसाधन सामग्री (जैसे- लिपिस्टिक) के अवशेष यहाँ मिले हैं।

★    हाथी का खिलौना

★    पित्तल की इक्का गाड़ी 

★    स्याही की दवात के साक्ष्य मिले हैं।

★    चन्हुदड़ो से किसी भी प्रकार के दुर्ग के साक्ष्य नहीं मिलते हैं।

★    यहाँ से बिल्ली के पीछे भागते हुए कुत्ते के पदचिह्न भी प्राप्त हुए हैं।

★    सम्पूर्ण सिन्धु सभ्यता का एकमात्र सभ्यता स्थल जहाँ से झुकर व झांगर संस्कृति के अवशेष प्राप्त होते हैं। 

रंगपुर :

★    रंगपुर गुजरात के काठियावाड़ प्रायद्वीप में मादर नदी के समीप स्थित है।

★    यहाँ पर पूर्वकालीन व उत्तरोतर हड़प्पा संस्कृति के अवशेष मिले हैं।

★    इस स्थल से चावल की भूसी के प्रमाण मिले हैं।

सुरकोटदा :

★    गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में इस स्थल की खोज सन् 1964 में जगपति जोशी ने की थी।

★    यहाँ से घोड़े की हड्डी के अवशेष मिले हैं।

★    यहाँ से कलश शवाधान के साक्ष्य मिले हैं।

★    यहाँ से ऊपर से कब्र को पत्थर से ढकने के साक्ष्य मिला है।

धौलावीरा

★    गुजरात राज्य के कच्छ जिले के भचाऊ में धौलावीरा स्थित है।

★    यहाँ से पॉलिशदार सफेद पाषाण खण्ड बड़ी संख्या में मिलते हैं।

★    यह नगर हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े नगरों में से है। 

★    धौलावीरा में जल संरक्षण से संबंधित उत्कृष्ट तकनीक का पता चलता है। 

★    यहाँ से सिंधु घाटी सभ्यता का एक मात्र स्टेडियम (खेल का मैदान) मिला है।

★    घोड़े की कलाकृतियों के अवशेष भी मिले हैं।     

★    अन्य हड़प्पाई स्थल के विपरीत धौलावीरा नगर तीन खंडों में विभाजित है–

1. दुर्ग         2. मध्यम नगर         3. निचला नगर

नोट : 2015-16 के सम्पूर्ण उत्खनन के बाद राखीगढी को भारत में सबसे बड़ा क्षेत्र माना गया है। (410 हैक्टेयर) 

सुत्कागेंडोर :

★    पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रान्त में दाश्क नदी पर सुत्कागेंडोर स्थित है। यह सिंधु घाटी सभ्यता का सबसे पश्चिमी ज्ञात नगर है। 

★    यहाँ से बंदरगाह के अस्तित्व का पता चला है।

आलमगीरपुर :

★    उत्तर प्रदेश राज्य के मेरठ जिले के हिंडन नदी के तट पर आलमगीरपुर स्थित है।

★    यहाँ से एक भी मातृदेवी की मूर्ति और मुद्रा प्राप्त नहीं हुई है।

★    इस पुरास्थल की खोज में ‘भारत सेवक समाज’संस्था का विशेष योगदान रहा।

★    यहाँ से उत्तर कालीन सैन्धव चरण के प्रमाण मिले हैं। 

★    रोटी बेलने की चौकी मिली है। बर्तनों पर मोर और गिलहरी की चित्रकारी है। एक रीछ और एक सांप की मृणमूर्ति मिली है।  

रोपड़ :

★    सन् 1950 में इसकी खोज बी.बी. लाल ने की ।

★    1956 ई. में यज्ञदत्त शर्मा ने उत्खनन करवाया।

★    यहाँ हड़प्पा पूर्व एवं हड़प्पाकालीन संस्कृतियों के अवशेष मिले हैं।

★    शवों को अंडाकार गड्ड़ों में दफनाया जाता था। 

★    यहाँ से मानवीय कब्र के नीचे एक कुत्ते का शव मिला हैं।

कोटदीजी :

★    यह स्थल हड़प्पा पूर्व और हड़प्पाकालीन दोनों से संबंधित है।

★    यहाँ मकान कच्ची ईंटों से बने हैं, परन्तु नीवों में पत्थर का प्रयोग हुआ है। 

राखीगढ़ी :

★    यह स्थल हरियाणा राज्य के जिंद जिले में स्थित है।

★    इस स्थल की खोज प्रो. सूरजभान और आचार्य भगवानदेव ने की थी।

★    भारत में स्थित हड़प्पा सभ्यता के विशालतम नगरों में से एक राखीगढ़ी है।

बनावली :

★    हरियाणा के हिसार जिले में। 1973-74 में आर. एस. विष्ट द्वारा उत्खनन हुआ। 

★    यहाँ से सभ्यता के तीनों स्तर प्रकाश में आए।

★    दुर्ग तथा निचले नगर में विभाजन नहीं, एक ही प्राचीर युक्त घेरा।

★    यहाँ से अग्नि वेदिका, दीवारों में ताखे, मकानों के पास चबूतरा, मिट्टी का बना हल, जौ के दाने का साक्ष्य मिला। 

★     यहाँ से ताँबे का वाणाग्र और कुल्हाड़ी मिली।

★    सड़के न तो सीधी मिलती है और न ही एक दूसरे को समकोण पर काटती है।

★    नाली पद्धति का अभाव। नगर योजना शतरंज के बोर्ड या जाल के आकार का है। 

★    एक आयताकार राजप्रासाद जैसा विशाल भवन भी मिला है। 

★    इसे समृद्धों का शहर कहते हैं (घरों से वॉसवेसिन का साक्ष्य तथा बड़े मकान) 

बालाकोट :

★    सोनमियानी खाड़ी के पूर्व विन्दार नदी के मुहाने पर, कराची से 88 किमी. दक्षिण-पश्चिम में अवस्थित। 

★    उत्खनन कार्य डेल्स (1979 ई.) द्वारा। 

★    प्राक् सैन्धव और सैन्धव स्तर मिले। 

★    भवन कच्ची ईंटों के एवं नाली पक्की ईंटों से बने हैं। 

★    यहाँ फर्श पर प्लास्टर के प्रमाण मिले हैं। 

★    सीप उद्योग समृद्ध स्थिति में, सम्भतः बंदरगाही नगर। 

अल्लाहदीनो : 

★    सिंधु और अरब सागर के संगम के पास।

★    1982 में फेयर सर्विस द्वारा उत्खनन। 

★    यहाँ से ताँबे की वस्तु तथा सोने-चांदी के आभूषण मिले। 

★    मिट्टी का बना एक खिलौना गाड़ी मिला। 

★    संभवत: यह बंदरगाह नगर था।

अलीमुराद : 

★    सिंध प्रांत में स्थित। 

★    यहाँ से बैल की लघु मृणमूर्ति मिली। काँसे की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई। 

आमरी :

★    यहाँ से बारहसिंगा का नमूना मिला है। 

माण्डा : 

★    चिनाब के दक्षिणी किनारे पर, सबसे उत्तरी स्थल। जम्मू कश्मीर में अखनूर के पास।

★    1982 में जे.पी. जोशी एवं मधुबाला द्वारा उत्खनन। यहाँ से सभ्यता के तीनों चरण प्राप्त। 

★    काँसे के पेंचदार पिन का तथा पूरे हड़प्पा क्षेत्र के लिए लकड़ियों की आपूर्ति किए जाने का साक्ष्य मिलता है। 

भगवानपुरा : 

★    हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिला में, सरस्वती के दक्षिणी किनारे पर। 

★    जे.पी. जोशी द्वारा उत्खनन। यहाँ से सैन्धव के पतनोन्मुख अवशेष मिले। 

★    कुनाल से प्राक् सैन्धव प्रमाण मिले। यहाँ से चाँदी के दो मुकुट मिले।  

देसलपुर : 

★     भुज जिले में मादर नदी के किनारे स्थित। 

★    उत्खनन 1964 में के. वी. सौन्दर राजन द्वारा।

★    यह प्राचीरयुक्त नगर था। सुरक्षा प्राचीर में स्थान-स्थान पर बुर्ज। 

रोजदी : 

★    सौराष्ट्र में, यहाँ तीनों चरण विद्यमान। 

★    यहाँ से बस्ती के चारों ओर बड़े-बड़े पत्थरों की बनी सुरक्षा दीवार। घर कच्ची ईंटों के चबूतरे पर निर्मित हैं। 

★    यहाँ से हाथी के अवशेष भी मिले। 

कुन्तासी : 

★    राजकोट जिले में। विकसित और उत्तर सैन्धव अवशेष मिले हैं। उत्खनन एम. के. धवलिकर और एम.आर. रावल द्वारा। 

★    सम्भवतः बंदरगाही नगर था यहाँ एक मकान से हजारों मनके तथा तीन अंगूठियाँ मिली हैं। 

दैमाबाद : 

★    अहमदनगर जिले में प्रवरा नदी के बाएँ किनारे पर (सबसे दक्षिणी स्थल)। 

★    यहाँ से काँसे का रथ मिला है जिसमें दो बैल एवं एक गाड़ीवान भी है।

★    यहाँ से मानव शवाधान के प्रमाण भी मिले। सुरकोटदा के समान कब्र के उत्तर में पत्थर रखे जाते थे। 

★    कुछ बर्तनों पर सैन्धव लिपि मिली है। 

हुलास : 

★    उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में। 

★    यहाँ से उत्तर कालीन सैन्धव चरण के प्रमाण मिले हैं। 

नेवासा : 

★    अंगूठी में लिपटे हुए रेशम का साक्ष्य। 

मालवण:- 

★    सूरत (गुजरात), ताप्ती के मुहाने पर, खोज आलचिन द्वारा, उत्खनन जे.पी. जोशी द्वारा 1970 ई. में। 

★    यहाँ से पूर्व से पश्चिम की ओर जाती हुई एक खाई मिली है जिसे सिंचाई की नहर कहा जाता है। 

पर्यावरण संरक्षण से संबंधित प्रमुख सम्मेलन

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सामाजिक और आर्थिक जीवन

★    इस सभ्यता के लोग भोजन में गेहूँ, जौ, खजूर एवं मांस खाते थे।

★    सूती एवं ऊनी दोनों वस्त्रों का प्रयोग करते थे।

★    मछली पकड़ना, शिकार करना, चौपड़, पासा खेलना आदि मनोरंजन के साधन थे।

★    समाज की इकाई परम्परागत तौर पर परिवार था। 

★    सिंधु घाटी सभ्यता के लोग साज-सज्जा पर भी ध्यान देते थे। खुदाई में स्त्री एवं पुरुष दोनों के आभूषण प्राप्त हुए हैं। 

★    इस सभ्यता के लोग शाकाहारी व मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन करते थे। 

★    सिंधु सभ्यता के लोग शांतिप्रिय थे। युद्ध का कोई साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है, संभवत: उन्हें तलवार के बारे में पता नहीं था।  

★    समाज:- शहर और गांव का विभेद, शहर के दुर्ग और रिहायशी इलाके में विभाजन तथा विभिन्न आकार-प्रकार के भवनों का अवशेष एवं कब्रगाहों से मिले विविध सामग्रियों में स्तर भेद के अलावा कलात्मक अवशेषों के अनेक प्रकार जो समाज के आर्थिक स्तर पर स्तरीकरण का स्पष्ट दर्शन कराते है। पुरोहित वर्ग, प्रशासकीय वर्ग, व्यापारी वर्ग, विविध शिल्पों से संबद्ध सामाजिक वर्ग, श्रमिक अथवा दास वर्ग के विद्यमान रहने का संकेत मिलता है। हड़प्पा के श्रमिक आवास के आधार पर विलर दास प्रथा के अस्तित्व को मानते हैं। समाज में महिलाओं की भूमिका का स्पष्ट पता नहीं चलता है। उनका कृषि समाज में उत्पादक महत्त्व रहा होगा, श्रृंगार प्रसाधनों का इस्तेमाल करती होंगी एवं नृत्य तथा ललित कला का भरपूर विकास हुआ होगा। देव समूह में भी महिलाओं को महत्त्व स्थान प्राप्त था। हो सकता है कि सिंधु एवं उसके निकटवर्ती क्षेत्र मातृप्रधान रहे होंगे। हलांकि राजस्थान एवं गुजरात के क्षेत्र में इस तरह का प्रमाण नहीं मिला है। काँस्य मूर्ति जो मोहनजोदडो में मिली है एवं अन्य नारी मृणमूर्तियों के आधार पर देवदासी प्रथा के प्रचलित होने का भी संकेत मिलता है। 

★    भोजन :- शाकाहार एवं माँसाहार का इस्तेमाल। दूध के उपयोग के बारे में स्पष्टता नहीं है (गाय की कोई मूर्ति नहीं मिली)। सब्जी का उत्पादन नहीं होता होगा। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा से अन्नागार मिला है। 

★    वस्त्र आभूषण :- सामान्यतया सूती वस्त्र एवं सर्दियों में ऊनी वस्त्र का भी इस्तेमाल होता था। समृद्ध लोग कढ़ाई किए वस्त्र भी धारण करते थे। ताम्र उस्तरा मिलने से हजामत का संकेत मिलता है, पुनः प्रस्तर मूर्ति के पुरुष की मूंछ पूरी तरह साफ है। श्रृंगार प्रसाधन (नख से शिख तक) जैसे नुपुर, अंगूठी, कमरधनी, चूड़ी, कंगन, बाजूबंद, झूमका आदि मिले हैं। हड़प्पा से सोने का कंगन, चन्हुदड़ो से लिपिस्टिक एवं मोहनजोदड़ो से गहने के ढेर मिले हैं। हड़प्पा से सोने के मनके वाले छह लड़ियों का हार मिला है एवं मोहनजोदड़ो से कार्निलियन के मनकों का हार मिला है। इसके लिए ताम्र, सोना, चांदी, सीप, हाथी दांत, लाजवर्द, गोमेद आदि का प्रयोग होता था। कंघा का प्रयोग अवश्य होता होगा जैसा कि बाल विन्यास से स्पष्ट होता है। हड़प्पा से प्रसाधन पेटी मिली है। 

★    मनोरंजन के साधन :- पासा खेलना (हड़प्पा से 7 पासा मिले है), शिकार, पशुओं एवं पक्षियों का द्वंद, मछली मारना, नृत्य आदि से जीवन की एकरसता भंग होती होगी। लोथल से पासा खेलने वाले बोर्ड के नमूने मिले हैं। 

धार्मिक जीवन

★    इस सभ्यता में कहीं से मंदिर के अवशेष नहीं मिले हैं।

★    लिंग पूजा के पर्याप्त प्रमाण हैं जिन्हें बाद में शिव के साथ जोड़ा गया है। पत्थर की कई योनि आकृतियाँ भी प्राप्त हुर्ह हैं, जिनकी पूजा प्रजनन शक्ति के रूप में की जाती थी।

★    इस सभ्यता के लोग पशुओं की भी पूजा करते थे।

★    वृक्ष पूजा के रूप में पीपल के वृक्ष की पूजा की जाती थी।

★    अग्निपूजा के प्रचलन के भी प्रमाण मिले हैं।

★    हड़प्पा सभ्यता में शव विसर्जन के तीनों तरीके सम्पूर्ण शव को पृथ्वी में गाड़ना, पशु – पक्षियों के खाने के पश्चात् शव के बचे हुए भाग को गाड़ना तथा शव को दाहकर उसकी भस्म गाड़ना प्रचलित थे।

★    सिंधु के नगरीकरण से उसका धर्म अभिन्न रूप से संबद्ध है। अभी तक उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर देवगण व पूजा पद्धति का ही संकेत हो पाता है और यहाँ से भी विवादास्पद निष्कर्ष ही निकाले जा सकते हैं। 

★    पक्षों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि धर्म के पीछे भी उनका दृष्टिकोण उपयोगितावादी रहा होगा एवं अंत्येष्टि में मिले शवकलश से पुनर्जन्म का प्रमाण मिलता है। हड़प्पाई उत्पादन या अर्थव्यवस्था से संबद्ध पहलुओं से जुड़े विभिन्न अवलम्बों की पूजा की जाती थी। यद्यपि कोई भी मंदिर का प्रमाण नहीं मिला है किंतु मूर्ति पूजा व्यापक स्तर पर होती थी। इसके अलावा पवित्र स्नान, एवं योग विधि, याज्ञिक पद्धति जो राजस्थान एवं गुजरात से मिली यज्ञ वेदिकाओं से स्पष्ट होता है जहाँ मातृदेवी के समान मूर्तियाँ नहीं मिली हैं। जादू एवं टोटम का प्रचलन रहा होगा।  

राजनीतिक स्थिति : 

★    हड़प्पा सभ्यता व्यापार और वाणिज्य आधारित थी। इसलिए शासन व्यवस्था में भी व्यापारी वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। 

★    पिगट और व्हीलर आदि विद्वानों का मत है कि सुमेर और अक्कद की भांति मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में भी पुरोहित लोग शासन करते थे। ये शासक प्रजा के हित का पूरा ध्यान रखते थे। सम्भवत: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा उनके राज्य की दो राजधानियाँ थी। 

★    हंटर के अनुसार, ‘मोहनजोदड़ो का शासन राजतंत्रात्मक न होकर जनतंत्रात्मक था।’ 

आर्थिक जीवन : 

★    पुरातात्त्विक साक्ष्य से यह अनुमान लगाया गया है कि सिन्धु सभ्यता के लोग हल या कुदाल से खेती नहीं करते थे। यह सम्भव है कि ये लोग पत्थर की कुल्हाड़ियों से या लकड़ी के हल से भूमि को खोदकर खेती करते हों। इन लोगों के औज़ार बहुत अपरिष्कृत थे किन्तु यहाँ के किसान अपनी आवश्यकता से अधिक अन्न उगाते थे। अतिरिक्त अन्न का उपयोग व्यापार और वाणिज्य में होता था।

★    सिन्धु घाटी के लोग खेती के अतिरिक्त बहुत-से उद्योग जानते थे। ये लोग कपास उगाना और कातना भली प्रकार जानते थे। यह संभव है कि कपास और सूती कपड़े का निर्यात किया जाता था। ये अनेक प्रकार के मिट्‌टी के बर्तन बनाते और कपड़ों को रंगते थे। 

★    सिन्धु घाटी के लोग अपनी वस्तुएँ मिस्र भी भेजते थे। यहाँ से कुछ मनके व हाथी दाँत का निर्यात किया जाता था। मेसोपोटामिया के एक ग्रंथ से ज्ञात होता है कि अक्कद साम्राज्य के समय में मेलुहा (सिन्धु घाटी सभ्यता) से आबनूस, तांबे, सोने, लालमणि और हाथीदाँत का निर्यात होता था।    

★    ये लोग बाटों का भी प्रयोग जानते थे। कुछ बाट घन के आकार के और कुछ गोलनुकिले हैं। उनकी तोल में 1, 2, 4, 8, 16, 32, 64 का अनुपात है। सबसे अधिक 16 इकाई का बाट प्रयोग में आता था।    

कृषि :

★    हड़प्पा संस्कृति की मुख्य फसलें गेहूँ और जौ थी। इसके अलावा वे राई, मटर, तिल, चना, कपास, खजूर, तरबूज आदि भी पैदा करते थे।

★    चावल के उत्पादन का प्रमाण लोथल और रंगपुर से प्राप्त हुआ है।

पशुपालन :

★    हड़प्पा सभ्यता में पाले जाने वाले मुख्य पशु थे – बैल, भेड़, बकरी, भैंस, सुअर, हाथी, कुत्ते, गधे आदि।

★    हड़प्पा निवासियों को कूबड़वाला सांड विशेष प्रिय था।

★    ऊँट, गैंडा, मछली, कछुए का चित्रण हड़प्पा संस्कृति की मुद्राओं पर हुआ है।

★    हड़प्पा संस्कृति में घोड़े के अस्तित्व पर विवाद है।

★    कालीबंगा से ऊँट की हड्डियां मिली है।

★    कुकुद्दमान बैल का विशेष महत्त्व। घड़ियाल का भी धार्मिक प्रयोजन रहा होगा। भेड़, बकरी, कुत्ता, हाथी, व्याघ्र (सिंह नहीं), मुर्गी आदि को पालतू बनाया गया होगा। गुजरात के लोग हाथी पालते थे। कालीबंगा से ऊँट की हड्डियाँ मिली हैं लेकिन ऊँट एवं घोड़े का अंकन मुहरों पर नहीं है। लोथल से घोड़े का जबड़ा एवं कालीबंगा से भी घोड़े के अवशेष मिलने की सूचना है। राणाघुदई के निम्न धरातल से घोड़े के दाँत (चवर्ण दांत) के अवशेष मिले है। पशुओं का इस्तेमाल – कृषि कार्य, मालवाहन, मांस, खाल, बाल एवं ऊन के लिए। 

शिल्प एवं उद्योग

    सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा एवं सीसा का ज्ञान था। सोने का कोई बर्तन नहीं मिला है। 

★    मोहनजोदड़ो:- चांदी के बर्तन पर लाल रंग (मजीठ) का कपड़ा, कालीबंगा – मिट्टी के बर्तन पर सूती वस्त्र की छाप, 

★    लोथल:- मुद्रांक पर सूती वस्त्र की छाप, आलमगीरपुर – बने वस्त्र के निशान, नेवासा – अंगूठी पर लिपटा रेशम, वस्त्रों पर कढाई भी होती थी। 

★    मृदभांड :- चाक और हाथ दोनों से बने होते थे। मुख्यतः लाल एवं गुलाबी एवं कुछ पर काली रेखाओं से चित्र बने होते थे। 

–    हड़प्पा धात्विक उपकरण निर्माण केन्द्र 

–    सुक्कूर में पत्थर के औजार बनाने वाली फैक्ट्री मिली है। यहाँ से चूना पत्थर के कारखाने का भी साक्ष्य मिला है। 

★    मनका निर्माण उद्योग :- चन्हुदड़ों एवं लोथल में मनके बनाने का कारखाना। मनका बनाने में सबसे ज्यादा सेलखड़ी का प्रयोग होता था। चन्हुदड़ो से सेलखड़ी के मुहर एवं चर्ट के बटखरे मिले हैं।  

★    सीप उद्योग :- बालाकोट एवं लोथल। अन्य उद्योगों में स्वर्णकार, शंख, सीप, हाथीदांत से विविध वस्तुओं का निर्माण। 

    सिंधु के नगरीकरण से उसका धर्म अभिन्न रूप से संबद्ध है। अभी तक उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर देवगण व पूजा पद्धति का ही संकेत हो पाता है और यहाँ से भी विवादास्पद निष्कर्ष ही निकाले जा सकते हैं। 

कला :

★    कला के क्षेत्र में सिन्धु घाटी के लोगों ने बहुत उन्नति की थी। वे बर्तनों पर सुन्दर चित्र बनाते थे। मनुष्यों और पशुओं के चित्र बड़ी संख्या में मिलते हैं। मुहरों पर जो पशुओं के चित्र बने हैं, उनसे इन लोगों की कलात्मक अभिरुचि प्रकट होती है। ये चित्र बैल, हाथी, चीता, बारहसिंगा, घड़ियाल, गैंडा आदि पशुओं के हैं। 

★    हड़प्पा में दो मनुष्यों की मूर्तियां मिली हैं जिनसे प्रकट होता है कि ये लोग मनुष्यों की मूर्तियाँ बनाने में भी बहुत कुशल थे। ध्यान मुद्रा में योगी की पत्थर की मूर्ति और कांसे की नर्तकी की मूर्ति सिन्धु घाटी की कला के सुन्दर नमूने है।  

व्यापार :

★    हड़प्पावासी राजस्थान, सौराष्ट्र, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत तथा बिहार से व्यापार करते थे।

★    मेसोपोटामिया, सुमेर तथा बहरीन से उनके व्यापारिक संबंध थे।

★    2350 ई. पू. के मेसोपोटामियाई अभिलेखों में मेलूहा (सिन्ध क्षेत्र का ही प्राचीन भाग) के साथ व्यापार संबंध होने के उल्लेख मिलते हैं।

मापतौल :

★    मोहनजोदड़ो से सीप का तथा लोथल से एक हाथी – दांत का पैमाना मिला है।

★    तौल पद्धति की एक श्रृंखला 1, 2, 4, 8 से 64 इत्यादि की तथा 16 या उसके आवर्तकों का व्यवहार होता था, जैसे -16, 64, 160, 320 और 640।

मुहर एवं लिपि :

★    मोहनजोदड़ो से सर्वाधिक संख्या में मुहरें प्राप्त हुई है।

★    प्राप्त मुहरों में सर्वाधिक सेलखड़ी की बनी हैं।

★    मुहरों पर एक शृंगी पशु की सर्वाधिक आकृति मिली है। लोथल और देसलपुर से तांबे की मुहरें मिली हैं।

★    हड़प्पा लिपि वर्णात्मक नहीं, बल्कि मुख्यतः भाव चित्रात्मक है।

★    इस लिपि की लिखावट सामान्यत: दायीं से बायीं ओर है।

★    हड़प्पाई लिपि को पढ़ने में अभी तक सफलता नहीं मिली है।

★    सैन्धव सभ्यता की लिपि भावचित्रात्मक थी। 

★    इस लिपि की पहली लाइन दाएँ से बाएँ तथा दूसरी लाइन बाएँ से दाएँ लिखी जाती है।

लिपि के नाम

●    सर्पिलाकार लिपि

●    गोमुत्राक्षर लिपि

●    बूस्ट्रोफेदन/फेदस/फेदम 

★    सिन्धु घाटी सभ्यता की लिपि को सर्वप्रथम पढ़ने का प्रयास ‘वेडेन महोदय’ ने किया था। इस लिपि को पढ़ने का प्रयास करने वाले प्रथम भारतीय व्यक्ति ‘नटवर झा’ थे, परन्तु पढ़ने में असफल रहे। 

★    इस लिपि में 64 मूल चिह्न हैं जबकि 250-400 तक चित्राक्षर हैं।

★    सर्वाधिक चित्राक्षर उल्टे यू  के आकार के है।

★    लिपि के साक्ष्य हड़प्पा के कब्रिस्तान H से मिलते हैं।

पतन संबंधी विचार 

विद्वानमत
कैनेडीमलेरिया जैसी किसी महामारी के कारण
टी.एच.लैम्ब्रिक, माधोस्वरूपवत्स एवं जी.एफ. देल्सनदियों के मार्ग परिवर्तन के कारण
आरेल स्टाइन एवं अमलानंद घोषजलवायु परिवर्तन के कारण
एम.आर.साहनी एवं हाइड्रोलाजिस्ट ‘राइक्स’भूतात्विक परिवर्तन एवं भारी-जलप्लावन के कारण
एम.दिमित्रियेव (रुसी विद्वान)अदृश्य गाज या भौतिक रासायनिक विस्फोट के कारण

ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियाँ 

★    इस काल में मनुष्य पत्थर एवं तांबे के उपकरण/औज़ार प्रयोग करने लगा था, इसी कारण इस काल को ‘ताम्रपाषाण काल’ कहते हैं। 

★    लगभग 5000 ई.पू. में मनुष्य ने सर्वप्रथम जिस धातु का प्रयोग किया, वह तांबा था। ताम्रपाषाण संस्कृतियाँ कृषि आधारित ग्रामीण संस्कृतियाँ थी। 

1.     बनास या आहड़ संस्कृति

★    प्रमुख स्थल- आहड़, बालाथल तथा गिलुंद (राजस्थान)।

2.     कायथा संस्कृति

★    प्रमुख स्थल-कायथा तथा एरण (मध्य प्रदेश)।

3.     मालवा संस्कृति

★    प्रमुख स्थल – कायथा, एरण तथा नवदाटोली

4.    जोरवे संस्कृति

★    प्रमुख स्थल- जोरवे, नेवासा, दैमाबाद तथा इनामगाँव (महाराष्ट्र)।

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