भ्रष्टाचार भारतीय प्रशासन का एक लम्बे समय से चला आ रहा गंभीर मुद्दा रहा है, जिसने जनता और सरकार के बीच विश्वास की खाई को गहरा किया है। ऐसे में ‘लोकपाल‘ का उदय एक मजबूत प्रयास के रूप में सामने आया है, जिसका उद्देश्य सरकारी तंत्र में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा देना है। 2013 में ऐतिहासिक जनआंदोलनों और जनदबाव के चलते यह संस्था अस्तित्व में आई, जो आज देश में उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों तक की जांच का अधिकार रखती है। आइए विस्तार से समझते हैं कि लोकपाल क्या है , इसका गठन कैसे हुआ, इसकी शक्तियाँ क्या हैं और इसका प्रशासन में क्या महत्व है।
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भारत में लोकपाल : भ्रष्टाचार-मुक्त शासन की ओर एक कदम
भारत में पारदर्शी, जवाबदेह और भ्रष्टाचार से मुक्त शासन की दिशा में एक बड़ी पहल के रूप में “लोकपाल” की संस्था का गठन किया गया है। केंद्र स्तर पर इसे लोकपाल कहा जाता है, जबकि राज्य स्तर पर इसका समकक्ष संस्था “लोकायुक्त” के नाम से जानी जाती है।
लोकपाल की उत्पत्ति और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
‘लोकपाल’ शब्द मूल रूप से संस्कृत के दो शब्दों – ‘लोक’ (जनता) और ‘पाल’ (रक्षक) – से मिलकर बना है, जिसका आशय है – जनता का रक्षक। हालांकि, इस विचार की जड़ें स्वीडन में वर्ष 1809 में शुरू हुई ‘ओम्बुड्समैन’ व्यवस्था में मिलती हैं, जहां इसे कुशासन के खिलाफ नागरिकों की सुरक्षा के लिए स्थापित किया गया था।
भारत में इस विचार की शुरुआत 1960 के दशक में हुई, जब तत्कालीन कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने संसद में एक स्वायत्त लोकपाल संस्था की आवश्यकता जताई। 1966 में मोरारजी देसाई की अध्यक्षता में गठित प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी नागरिकों की शिकायतों के समाधान के लिए लोकपाल एवं लोकायुक्त की नियुक्ति की सिफारिश की।
लोकपाल विधेयक से कानून बनने तक का सफर
सबसे पहले 1968 में इंदिरा गांधी सरकार ने लोकपाल विधेयक संसद में पेश किया, लेकिन यह पारित नहीं हो सका। इसके बाद कई बार प्रयास हुए, लेकिन राजनीतिक सहमति न बन पाने के कारण यह विधेयक ठंडे बस्ते में जाता रहा।
2011 में अन्ना हज़ारे द्वारा चलाए गए जन लोकपाल आंदोलन ने इस विषय को राष्ट्रीय बहस का केंद्र बना दिया। जनदबाव के परिणामस्वरूप दिसंबर 2013 में संसद ने लोकपाल विधेयक पारित किया और 1 जनवरी 2014 को यह “लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम, 2013” के नाम से एक कानून बन गया। इसे 16 जनवरी 2014 से देशभर में लागू कर दिया गया।
लोकपाल अधिनियम 2013 की प्रमुख विशेषताएं
- केंद्र में लोकपाल और राज्यों में एक वर्ष के भीतर लोकायुक्त की नियुक्ति अनिवार्य की गई है।
- लोकपाल की नियुक्ति के लिए एक उच्चस्तरीय चयन समिति बनाई गई है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (या उनके द्वारा नामित न्यायाधीश) और राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल होते हैं।
- वर्तमान लोकपाल अध्यक्ष हैं – न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष।
लोकपाल की संरचना और सदस्यता
- लोकपाल में कुल एक अध्यक्ष और आठ सदस्य होते हैं।
अध्यक्ष पद के लिए योग्यता
- सुप्रीम कोर्ट का पूर्व न्यायाधीश या
- भ्रष्टाचार निरोध, वित्त, प्रशासन आदि क्षेत्रों में कम से कम 25 वर्षों का अनुभव रखने वाला प्रतिष्ठित व्यक्ति।
सदस्यता का आरक्षण:
- आठ में से चार सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि से होंगे।
- शेष चार में से कम से कम एक-एक सदस्य अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक और महिला वर्ग से होना अनिवार्य है।
अयोग्यता
- संसद या विधानसभा का सदस्य, पंचायत/नगर निगम का प्रतिनिधि, नैतिक भ्रष्टाचार में दोषी पाया गया व्यक्ति, 45 वर्ष से कम आयु वाला, बर्खास्त सरकारी कर्मचारी – इन सभी को लोकपाल का सदस्य नहीं बनाया जा सकता।
कार्यकाल
- लोकपाल अध्यक्ष और सदस्य का कार्यकाल 5 वर्ष या अधिकतम 70 वर्ष की आयु तक होगा।
- पद से हटने के बाद ये पुनर्नियुक्त नहीं हो सकते और न ही अगले 5 वर्षों तक किसी चुनाव में भाग ले सकते हैं।
लोकपाल का अधिकार क्षेत्र
- प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में आते हैं, लेकिन उनकी शिकायतों की जांच के लिए एक विशेष प्रक्रिया तय की गई है।
- केंद्रीय मंत्री, सांसद, सचिव स्तर के अधिकारी, यहां तक कि सरकारी कर्मचारी और जनता से चंदा लेने वाले NGO या विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संस्थान भी इसके अंतर्गत आते हैं।
जांच प्रक्रिया
- शिकायत पर 60 दिनों के भीतर प्रारंभिक जांच और 6 महीने में पूरी जांच पूरी करनी होती है।
- लोकपाल के पास खुद की एक प्रॉसिक्यूशन विंग (अभियोजन शाखा) होती है, जो जांच एजेंसियों के माध्यम से विशेष अदालत में केस चलाने का अधिकार रखती है।
- लोकपाल के मामलों में CBI उसकी अधीनस्थ होगी और जांच से जुड़े अधिकारियों के तबादले पर रोक होगी।
दंड का प्रावधान
- झूठी या फर्जी शिकायत पर 1 साल की सजा और ₹2 लाख का जुर्माना।
- सरकारी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार साबित होने पर 7 साल तक की सजा।
- गंभीर आपराधिक या आदतन भ्रष्टाचार साबित होने पर 10 साल की सजा।
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FAQs : लोकपाल से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: लोकपाल क्या है और इसकी क्या भूमिका है ?
उत्तर: लोकपाल एक स्वायत्त संस्था है जो केंद्र सरकार के अधिकारियों, मंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्री तक के विरुद्ध भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करती है।
प्रश्न: लोकपाल और लोकायुक्त में क्या अंतर है ?
उत्तर: लोकपाल केंद्र सरकार से संबंधित मामलों की जांच करता है, जबकि लोकायुक्त राज्यों में इसी तरह की जिम्मेदारी निभाते हैं।
प्रश्न: भारत में लोकपाल की शुरुआत कब हुई ?
उत्तर: लोकपाल अधिनियम 2013 को संसद ने दिसंबर 2013 में पारित किया और यह 16 जनवरी 2014 से लागू हुआ।
प्रश्न: लोकपाल का गठन कैसे होता है ?
उत्तर: लोकपाल का चयन प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, विपक्ष के नेता, सुप्रीम कोर्ट के जज और एक प्रतिष्ठित व्यक्ति वाली चयन समिति द्वारा किया जाता है।
प्रश्न: क्या प्रधानमंत्री भी लोकपाल के दायरे में आते हैं ?
उत्तर: हां, लेकिन प्रधानमंत्री पर जांच की एक विशेष प्रक्रिया होती है ताकि सत्ता के दुरुपयोग की आशंका से बचा जा सके।
प्रश्न: लोकपाल के पास कौन-कौन से अधिकार हैं ?
उत्तर: लोकपाल के पास शिकायतों की जांच, अभियोजन की अनुशंसा, जांच एजेंसियों को निर्देश देने और विशेष अदालत में मुकदमा चलवाने का अधिकार है।
प्रश्न: लोकपाल के अध्यक्ष और सदस्यों की योग्यता क्या है ?
उत्तर: अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज या प्रशासन/कानून/वित्त क्षेत्र में 25 वर्ष का अनुभव रखने वाला प्रतिष्ठित व्यक्ति होना चाहिए।
प्रश्न: लोकपाल का कार्यकाल कितना होता है?
उत्तर: अध्यक्ष और सदस्य 5 वर्षों या अधिकतम 70 वर्ष की आयु तक पद पर रह सकते हैं।
प्रश्न: क्या CBI लोकपाल के अधीन होती है ?
उत्तर: लोकपाल से संबंधित मामलों की जांच में CBI को लोकपाल की निगरानी में कार्य करना होता है और जांच अधिकारियों का ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।
प्रश्न: क्या झूठी शिकायत करने पर सजा का प्रावधान है ?
उत्तर: हां, झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायत करने पर एक वर्ष की सजा और दो लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।








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